मनरेगा सुदूर सड़क में जेसीबी कांड: मडकापार पंचायत में भ्रष्टाचार का मड़का फूटने की आहट। जांच टीम फोड़ेगी भ्रष्टाचार का मड़का
22 Jan, 2026
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नायक दर्पण/बालाघाट।
किरनापुर जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत मडकापार में मनरेगा योजना के तहत चल रहे सुदूर सड़क निर्माण कार्य ने शासन की पारदर्शिता और रोजगार आधारित सोच पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मजदूरों को रोजगार देने के उद्देश्य से शुरू की गई इस योजना में जेसीबी मशीन से कार्य कराए जाने का मामला सामने आने के बाद अब पूरा पंचायत तंत्र कटघरे में आ खड़ा हुआ है। प्रशासन द्वारा गठित जांच टीम से जुड़े सूत्रों का दावा है कि यह मामला केवल मशीन के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे संगठित भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें छिपी हुई हैं। मनरेगा में स्पष्ट प्रावधान है कि सुदूर सड़क जैसे कार्यों में प्राथमिकता श्रमिकों को दी जाएगी और मशीनों का उपयोग प्रतिबंधित रहेगा। इसके बावजूद मडकापार पंचायत में नियमों को दरकिनार कर जेसीबी से सड़क निर्माण कराया गया, जबकि कागजों में मजदूरों की उपस्थिति और भुगतान दर्ज किया गया। यही नहीं, मजदूरों की डिजिटल हाजिरी (NMMS), मस्टर रोल और कार्य प्रगति रिपोर्ट में भी गंभीर अनियमितताओं की आशंका जताई जा रही है।
सूत्र बताते हैं कि जांच टीम अब केवल सतही जांच नहीं करेगी, बल्कि भुगतान रजिस्टर, मस्टर रोल, बैंक खातों में मजदूरी की एंट्री, और मशीन उपयोग से जुड़े साक्ष्यों की भी बारीकी से पड़ताल करेगी। ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि मजदूरों के नाम पर जारी की गई राशि का बड़ा हिस्सा वास्तविक श्रमिकों तक पहुंचा ही नहीं। यदि यह पुष्टि होती है, तो यह मामला फर्जी हाजिरी और शासकीय धन के गबन की श्रेणी में आ जाएगा। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत में लंबे समय से विकास कार्यों में मशीनों का बोलबाला है और मनरेगा जैसी योजनाएं केवल कागजों तक सिमट कर रह गई हैं। मजदूरी की आस में काम मांगने वाले ग्रामीणों को या तो काम नहीं दिया गया, या फिर नाम जोड़कर खानापूर्ति की गई। वहीं दूसरी ओर, पंचायत प्रतिनिधियों और संबंधित अधिकारियों की मिलीभगत से मशीनों द्वारा कार्य कराकर समय और लागत के नाम पर सरकारी धन की बंदरबांट की गई। जानकारों का मानना है कि यह मामला केवल एक पंचायत तक सीमित नहीं है। यदि जांच निष्पक्ष हुई तो मडकापार मॉडल के जरिए पूरे क्षेत्र में मनरेगा और सुदूर सड़क कार्यों की पोल खुल सकती है। जांच टीम के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब शासन स्तर पर डिजिटल निगरानी, जियो-टैगिंग और ऑनलाइन हाजिरी जैसी व्यवस्थाएं लागू हैं, तो फिर इतने खुलेआम नियमों की अनदेखी कैसे हुई?प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, दोषी पाए जाने पर सरपंच, सचिव, रोजगार सहायक और उपयंत्री पर कड़ी कार्रवाई की सिफारिश की जा सकती है। इसमें वसूली, निलंबन और एफआईआर तक की संभावना से इंकार नहीं किया जा रहा।
फिलहाल पूरे मामले पर ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों की निगाहें टिकी हुई हैं। अब देखना यह होगा कि जांच टीम वास्तव में भ्रष्टाचार का मड़का फोड़ पाती है, या यह मामला भी अन्य फाइलों की तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा। मडकापार पंचायत का यह मामला शासन की मंशा और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को उजागर करता है, जो आने वाले दिनों में प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
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