रानी दुर्गावती चौक पर शोकसभा में उठी आवाज... बैगा बच्चों की मौत पर आक्रोश गोंड समाज महासभा ने कैंडल जलाकर दी श्रद्धांजलि... मृतक परिवार को 1 करोड़ मुआवजा की मांग...!

07 Sep, 2026 55 व्यूज
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सिवनी नायक दर्पण

बालाघाट जिले के बिरसा क्षेत्र में बैगा आदिवासी परिवारों के मासूम बच्चों की असामयिक मृत्यु की घटना को लेकर सिवनी जिले में भी आक्रोश और शोक का माहौल देखने को मिला। घटना के विरोध में गोंड समाज महासभा जिला सिवनी, मातृशक्ति संगठन सहित विभिन्न आदिवासी संगठनों के संयुक्त तत्वावधान में रानी दुर्गावती चौक पर शोकसभा एवं कैंडल मार्च आयोजित किया गया। इस दौरान समाजजनों ने कैंडल जलाकर दिवंगत बच्चों को श्रद्धांजलि अर्पित की और दो मिनट का मौन रखकर मृत आत्माओं की शांति के लिए प्रार्थना की।
शोकसभा में गोंड समाज महासभा के जिला अध्यक्ष चित्तौड़ सिंह कुशराम, कार्यकारी जिला अध्यक्ष लक्ष्मण सिंह मर्सकोले, कोषाध्यक्ष अशोक सिरसाम, आर्थिक प्रकोष्ठ जिला अध्यक्ष संतोष बरकड़े तथा नगर अध्यक्ष चिंटा सलामे सहित बड़ी संख्या में समाजजन मौजूद रहे।
मातृशक्ति संगठन की ओर से सरोज मरावी, सुशीला कुंजाम, वंदना सल्लाम, सविता नरवेती, डॉ. वंदना कमलेश, सुशीला मर्सकोले और विजया उइके ने भी कार्यक्रम में सहभागिता करते हुए घटना पर आक्रोश व्यक्त किया। वक्ताओं ने पीड़ित परिवारों को न्याय और उचित राहत देने की मांग उठाई।

कार्यक्रम में वक्ताओं ने आरोप लगाया कि बिरसा क्षेत्र के बैगा आदिवासी अंचल में स्वास्थ्य सेवाओं और बुनियादी सुविधाओं की कमी तथा प्रशासनिक स्तर पर कथित लापरवाही के कारण यह दुखद स्थिति बनी। संगठनों ने सरकार से घटना की निष्पक्ष जांच कराकर जिम्मेदारी तय करने की मांग की।
समाज प्रतिनिधियों ने कहा कि पीड़ित परिवारों को दी जा रही राहत राशि पर्याप्त नहीं है। उन्होंने प्रत्येक मृतक बच्चे के परिवार को एक करोड़ रुपये का मुआवजा देने की मांग रखी।

आदिवासी संगठनों ने मांग की कि घटना के लिए जिम्मेदार पाए जाने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय कर उनके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाए। साथ ही घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए संबंधित विभाग के मंत्री के इस्तीफे की मांग भी उठाई गई।
रानी दुर्गावती चौक पर मौजूद सामाजिक संगठनों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर शासन स्तर से शीघ्र सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया तो आदिवासी समाज व्यापक लोकतांत्रिक आंदोलन करेगा। संगठनों ने कहा कि यह केवल मुआवजे का सवाल नहीं, बल्कि आदिवासी परिवारों के अधिकार, स्वास्थ्य सुविधाओं और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा गंभीर मुद्दा है।