मडकापार में जेसीबी कांड के बाद बयानबाजी तेज, जांच की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल
20 Jan, 2026
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नायक दर्पण/बालाघाट।
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किरनापुर जनपद की ग्राम पंचायत मडकापार में मनरेगा सुदूर सड़क निर्माण कार्य में सामने आए जेसीबी कांड ने अब एक नए मोड़ पर विवाद खड़ा कर दिया है। श्रमिक आधारित योजना में खुलेआम मशीनों के इस्तेमाल के वीडियो और तस्वीरें वायरल होने के बाद जहां ग्रामीणों में आक्रोश है, वहीं जिम्मेदारों की ओर से लगातार दिए जा रहे विरोधाभासी बयान पूरे प्रकरण को जांच से पहले बयानबाजी और लीपापोती की ओर ले जाते नजर आ रहे हैं। सवाल यह नहीं है कि मशीन चली या नहीं बल्कि यह है कि नियमों के इतने खुले उल्लंघन के बावजूद अब तक किसी पर ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
मनरेगा जैसी योजना का मूल उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में श्रमिकों को रोजगार उपलब्ध कराना है। सुदूर सड़क जैसी योजना में मशीनों के उपयोग पर स्पष्ट प्रतिबंध है। इसके बावजूद मडकापार में जेसीबी से काम कराए जाने के प्रमाण सामने आए। वीडियो और तस्वीरों में साफ तौर पर देखा जा सकता है कि सुदूर सड़क निर्माण में भारी मशीनों का उपयोग किया गया। इसके बाद भी न तो मौके पर काम रोका गया न ही मशीन जब्त की गई और न ही संबंधित मस्टरोल को निरस्त किया गया। यह स्थिति अपने आप में प्रशासनिक उदासीनता और संभावित संरक्षण की ओर इशारा करती है।
सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि मामले के उजागर होने के बाद जिम्मेदारों ने स्वीकार करने के बजाय तर्कों का ऐसा जाल बुना जिसने संदेह को और गहरा कर दिया। उपयंत्री द्वारा दिया गया कथित बयान कि किसान ने निजी खर्च से अपनी जेसीबी चलवाई न केवल नियमों की अवहेलना है, बल्कि सरकारी व्यवस्था की गंभीर खिल्ली भी उड़ाता है। यदि यह तर्क मान लिया जाए तो सवाल उठता है कि क्या अब शासकीय सुदूर सड़कें निजी दान से बनेंगी? क्या किसान ठेकेदार की भूमिका निभा रहा है? और यदि मशीन निजी थी तो फिर सरकारी बिल श्रमिक मद और मजदूरी भुगतान किस आधार पर किया गया?
ग्रामीणों कि माने तो जब मामला मीडिया के माध्यम से सामने आया तब जिम्मेदारों ने जांच चल रही है का रटा-रटाया जुमला दोहराना शुरू कर दिया। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि न तो भुगतान रोका गया न ही फर्जी हाजरी पर कोई ठोस कदम उठाया गया। उल्टा फर्जी मजदूरी भुगतान को सही ठहराने के लिए बयान गढ़े जा रहे हैं। इससे यह संदेश जा रहा है कि जांच केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी और दोषी सुरक्षित रहेंगे। प्रकरण में सरपंच नंदकिशोर चंद्रवंशी, सचिव यशवंतराव मलये, रोजगार सहायक और उपयंत्री दिनेश लिल्हारे की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। तो वहीं मीडिया की टीम से ग्रामीणों ने नाम ना छापने के शर्त में स्पष्ट कहना है कि यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो इन सभी जिम्मेदार पदाधिकारियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए थी। लेकिन अब तक न तो निलंबन हुआ न ही प्राथमिकी दर्ज की गई। इससे यह आशंका और मजबूत होती है कि पंचायत स्तर पर कानून से ऊपर कोई अदृश्य शक्ति काम कर रही है।
ऊपर से संरक्षण की बू:— ग्रामीणों में यह चर्चा आम है कि इस पूरे मामले में ऊपर से संरक्षण के बिना ऐसा खुला खेल संभव नहीं। यदि नियमों का उल्लंघन इतना स्पष्ट है, तो कार्रवाई का अभाव किसी गहरी साठगांठ की ओर इशारा करता है। मीडिया टीम को नाम न छापने की शर्त पर कई ग्रामीणों ने बताया कि यदि आम मजदूर से एक दिन की हाजिरी में गलती हो जाए तो तुरंत कार्रवाई होती है, लेकिन यहां लाखो की योजना में मशीनरी के इस्तेमाल पर भी चुप्पी साध ली गई है।
ग्रामीणों की मांग है कि अब सिर्फ जांच के नाम पर समय खींचने से काम नहीं चलेगा। वे चाहते हैं कि इस मामले में तत्काल कार्यवाही की जाए मस्टरोल निरस्त किए जाएं श्रमिक मद से किए गए भुगतान की वसूली हो और दोषियों को निलंबित किया जाए। उनका कहना है कि यह मामला केवल एक सड़क निर्माण का नहीं बल्कि सरकारी मंशा बनाम पंचायत की नीयत का है। विकसित भारत की बात करने वाली सरकार के दौर में मडकापार की यह तस्वीर कई सवाल खड़े करती है। एक ओर पारदर्शिता, डिजिटल हाजिरी और सख्त नियमों की बात की जाती है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर मशीनरी मॉडल अपनाकर श्रमिकों के हक पर डाका डाला जा रहा है। अब देखना यह है कि जांच वास्तव में भ्रष्टाचार की परतें खोलती है या फिर यह प्रकरण भी फाइलों में दबकर रह जाएगा। जनता की निगाहें प्रशासन और जांच एजेंसियों पर टिकी हैं, क्योंकि मडकापार का फैसला सिर्फ एक पंचायत नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की साख तय करेगा।
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