आयुष शोध केंद्र: जनस्वास्थ्य नहीं राजनीतिक संरक्षण में पल रहा लापरवाही का अड्डा! 85 लाख की योजना ठेकेदार,अधिकारी गठजोड़ पर गंभीर सवाल
18 Jan, 2026
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नायक दर्पण/बालाघाट।
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बालाघाट जिले में निर्माणाधीन आयुष शोध केंद्र (इम्यूनिटी सेंटर) अब जनस्वास्थ्य की उम्मीद से अधिक राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक लापरवाही का प्रतीक बनता जा रहा है। आयुष मंत्रालय की महत्वाकांक्षी योजना जिसका उद्देश्य ग्रामीण अंचलों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना है वही योजना आज ठेकेदारों और अधिकारियों के लिए कमाई का साधन बनती नजर आ रही है।परसवाड़ा क्षेत्र भादुकोटा में 85.45 लाख रुपये की लागत से बन रहे इस केंद्र का निर्माण मध्य प्रदेश गृह निर्माण एवं अधोसंरचना विकास मंडल से मिली स्वीकृति और निर्माण कार्य संविदाकार मां दुर्गा एसोशिएट्म् द्वारा कराया जा रहा है। कागजों में कार्य प्रगति पर है बोर्ड पर तारीखें चमक रही हैं लेकिन जमीनी हकीकत सरकारी दावों को मुंह चिढ़ा रही है।
सत्ता का संरक्षण,ठेकेदार की मनमानी
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स्थानीय जागरूक नागरिकों ने नाम न छापने के शर्त पर सीधा आरोप लगाते हुए बताया है कि ठेकेदार मां दुर्गा एसोसिएट्म् को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। इसी कारण निर्माण गुणवत्ता की कोई परवाह नहीं की जा रही घटिया निर्माण सामग्री,अधूरा कार्य और तकनीकी मानकों की खुलेआम अनदेखी हो रही है,लेकिन जिम्मेदार अधिकारी आंख मूंदे बैठे हैं। प्रश्न यह उठता है कि जब यह निर्माण कार्य जनता के टैक्स के पैसे से हो रहा है तो फिर गुणवत्ता से समझौता किसके इशारे पर किया जा रहा है? क्या ठेकेदार को यह छूट किसी विधायक, मंत्री या प्रभावशाली नेता के संरक्षण में मिल रही है?
अधिकारी सिर्फ फाइलों में सक्रिय
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निर्माण कार्य की निगरानी करने वाले विभागीय इंजीनियर और अधिकारी केवल कागजों में निरीक्षण करते नजर आ रहे हैं। स्थानीय जागरूक लोगों कि माने तो जब से निर्माण कार्य शुरू हुआ तब से किसी वरिष्ठ अधिकारी ने निर्माण स्थल का गंभीर निरीक्षण नहीं किया। निरीक्षण रजिस्टर भले ही भरा जा रहा हो लेकिन हकीकत में कार्य भगवान भरोसे चल रहा है। यह सवाल भी उठ रहा है कि जब गृह निर्माण मंडल जैसे विभाग में पूरी तकनीकी टीम मौजूद है, तो फिर इतनी बड़ी परियोजना में लापरवाही कैसे संभव है? या फिर जानबूझकर आंखें मूंदी जा रही हैं?
मजदूरों की सुरक्षा भी राजनीतिक उपेक्षा की शिकार
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निर्माण स्थल पर मजदूर बिना हेलमेट,बिना सुरक्षा उपकरणों के काम कर रहे हैं। खुले सरिए, गड्ढे और भारी मशीनरी दुर्घटना को न्योता दे रही है। यदि कोई बड़ा हादसा होता है तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या मजदूरों की जान इतनी सस्ती हो गई है कि ठेकेदार और प्रशासन दोनों चुप्पी साधे बैठे हैं? आयुष शोध केंद्र को सरकार जनस्वास्थ्य की क्रांतिकारी पहल बताती है, लेकिन यदि यही केंद्र घटिया निर्माण का शिकार हो गया तो यह स्वास्थ्य सुविधा नहीं राजनीतिक शर्मिंदगी बनेगा। ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय नेता आयुष, योग और इम्यूनिटी की बातें करते नहीं थकते लेकिन जब योजनाओं को ईमानदारी से लागू करने का समय आता है तब सब गायब हो जाते हैं।
समयसीमा सिर्फ दिखावा?
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कार्य पूर्ण करने की संभावित तारीख 14 अप्रैल 2026 निर्धारित है, लेकिन मौजूदा कार्य गति और अव्यवस्था को देखकर यह साफ प्रतीत होता है कि या तो निर्माण अधूरा छोड़ा जाएगा या फिर जल्दबाजी में कमजोर ढांचा खड़ा कर दिया जाएगा। इससे भविष्य में मरम्मत के नाम पर फिर सरकारी खजाने पर डाका डाला जाएगा। स्थानीय जागरूक नागरिको ने इस निर्माण को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है। नाम न छापने की शर्त में उन्होंने कहना है कि यह मामला सिर्फ एक भवन का नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की सड़ांध को उजागर करता है। मांग की जा रही है कि इस निर्माण कार्य की विजिलेंस और तकनीकी ऑडिट जांच कराई जाए और दोषी अधिकारियों व ठेकेदारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाए। सबसे बड़ा सवाल यही है क्या आयुष शोध केंद्र वास्तव में जनता की सेहत सुधारने के लिए बन रहा है या फिर यह भी अन्य योजनाओं की तरह राजनीतिक प्रचार और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाएगा? यदि प्रशासन ने समय रहते कार्रवाई नहीं की तो यह मामला आने वाले समय में बड़े राजनीतिक आंदोलन और जनआक्रोश का कारण बन सकता है।
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