225 कर्मचारियों को नोटिश! एक्शन मोड में डीईओ धनश्री जैन, बेनकाब हुई नामी गिरामी स्कूलों की 'अंधेरगर्दी'। स्कूल शिक्षा पोर्टल की रिपोर्ट में सामने आई बड़ी लापरवाही, शिक्षक से लेकर प्राचार्य और कर्मचारियों तक के नाम सूची में शामिल।

07 Jul, 2026 1,321 व्यूज
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नायक दर्पण/बालाघाट।
मध्य प्रदेश के शिक्षा विभाग द्वारा पारदर्शी व्यवस्था और अनुशासन के नाम पर लागू की गई 'ई-अटेंडेंस' प्रणाली की बालाघाट जिले में धज्जियां उड़ती नजर आ रही हैं। 6 जुलाई 2026 को जारी 'लोक सेवक कर्मचारी अटेंडेंस नॉट पंच' की रिपोर्ट ने विभाग के दावों की हवा निकाल दी है। रिपोर्ट में जिले के 225 ऐसे कर्मचारियों के नाम सामने आए हैं, जिन्होंने अपनी जिम्मेदारी को दरकिनार करते हुए डिजिटल हाजिरी लगाने तक की जहमत नहीं उठाई। जो उनके उदासीन रवैये और जवाबदेही के अभाव को दर्शाता है। लेकिन नवागत डीईओ धनश्री जैन कार्यभार संभालते ही एक्शन मोड में नजर आई और उन्होने नामी-गिरामी स्कूलो में चल रही अंधेरगर्दी को बेनकाब कर दिया। ऐसा पहली दफा हुआ है कि किसी संबंध में इतनी बडी संख्या में कर्मचारियों को नोटिश जारी किया गया है।
दरअसल, राज्य सरकार ने सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाने के लिये शिक्षको की उपस्थिति को अनिवार्य माना है। इसे लेकर ही ई-अटेंडेंस प्रणाली लागू की गई है। लेकिन जैसे ही प्रणाली लागू हुई, शिक्षको ने इसका पूरजोर विरोध करना चाहा। लेकिन सरकार ने अपना निर्णय वापस नही लिया। सरकार का उद्देश्य स्पष्ट है कि शिक्षक समय पर स्कूल पहुंचें और बच्चों का भविष्य संवारें। लेकिन बालाघाट में 225 शिक्षको को जारी हुई नोटिश सूची ने प्रमाणित कर दिया कि सरकारी फरमानों को धरातल पर लागू करने के प्रति न तो शिक्षक गंभीर हैं और न ही विभाग का आलाकमान।
सूची में दर्ज 225 नामों में केवल निचले स्तर के कर्मचारी ही नहीं, बल्कि प्राचार्य, व्याख्याता, उच्च माध्यमिक शिक्षक और लिपिक जैसे जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग भी शामिल हैं। जब एक प्राचार्य ही अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में विफल रहता है, तो वह अपने अधीन कार्यरत शिक्षकों को अनुशासन का पाठ कैसे पढ़ाएगा? यह प्रश्न न केवल शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर, बल्कि उन प्रशासनिक अधिकारियों की दक्षता पर भी सवाल उठाता है, जिनके कंधों पर जिले की शिक्षा व्यवस्था की निगरानी का जिम्मा है।
हैरानी की बात यह है कि इस लापरवाही की सूची में केवल ग्रामीण अंचल के स्कूल ही नहीं, बल्कि बालाघाट जिले के प्रमुख संस्थान जैसे शासकीय उत्कृष्ट विद्यालय, पीएमश्री विद्यालय और संदीपनी विद्यालय जैसे बड़े नाम भी शामिल हैं। जिन संस्थानों को आदर्श माना जाता है, वहां के कर्मचारियों की यह कार्यशैली पूरी शिक्षा व्यवस्था के लिए शर्मनाक है। बालाघाट, कटंगी, किरनापुर, लांजी, लालबर्रा, खैरलांजी और वारासिवनी जैसे विकासखंडों से इतनी बड़ी संख्या में उपस्थिति दर्ज न होना यह संकेत देता है कि व्यवस्था में कहीं न कहीं ढिलाई का खेल चल रहा है।
मीडिया पड़ताल में यह जानकारी भी निकलकर सामने आई कि कुछ कर्मचारी नेटवर्क समस्या या तकनीकी खराबी का हवाला देकर अपना बचाव कर रहे है। लेकिन सवाल यह है कि क्या 225 कर्मचारियों के साथ वास्तव में तकनीकी समस्या हुई? क्या यह संभव है कि जिले के अलग-अलग ब्लॉकों में एक साथ डिजिटल तंत्र फेल हो जाए? सच्चाई इसके उलट है। यह व्यवस्था के प्रति उपेक्षा का परिणाम है। ई-अटेंडेंस के आने से उन शिक्षकों की मनमानी पर अंकुश लगा है जो स्कूल जाने के बजाय घर बैठना पसंद करते थे। संभव है कि इसी 'अंकुश' से बचने के लिए अब इन कर्मचारियों ने नया रास्ता खोज लिया हो, हाजिरी ही न लगाओ, तो पकड़े कैसे जाओगे?
बालाघाट में शिक्षा विभाग के भीतर व्याप्त इस अराजकता के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार अधिकारी दोषी हैं। यदि समय रहते इन लापरवाहों पर सख्त कार्रवाई की गई होती, तो आज यह आंकड़ा इतना बड़ा नहीं होता। शिक्षा विभाग में 'नोटिस' और 'स्पष्टीकरण' का खेल पुराना हो चुका है। अब जरूरत है कठोर दंडात्मक कार्रवाई की। वेतन कटौती से लेकर निलंबन तक की कार्यवाही ही इन कर्मचारियों में सुधार ला सकती है। क्या सरकार और शिक्षा विभाग इस 225 की सूची के खिलाफ कार्रवाई का साहस दिखा पाएंगे? या फिर यह मामला भी पुरानी फाइलों की धूल में दफन हो जाएगा? यदि व्यवस्था ऐसे ही चलती रही, तो सरकारी स्कूलों के प्रति अभिभावकों का भरोसा पूरी तरह टूट जाएगा।
बालाघाट की जनता अब यह देखना चाहती है कि क्या शिक्षा विभाग वाकई में 'शिक्षा की गुणवत्ता' चाहता है, या फिर यह पूरी कवायद केवल आंकड़ों के हेरफेर तक सीमित रहेगी? सवाल 225 कर्मचारियों का नहीं, बल्कि बालाघाट के उन हजारों बच्चों के भविष्य का है, जिन्हें स्कूल में शिक्षक तो मिलते हैं, लेकिन उनकी उपस्थिति की जवाबदेही आज भी दांव पर लगी है।