पंचायत भवन बना पार्टी अड्डा: सरकारी प्रतीक वाले केक पर जन्मदिन मना सचिव ने उड़ाई स्वशासन की गरिमा। लामता ग्राम पंचायत में कार्यालय समय के दौरान जन्मदिन समारोह पर उठे सवाल। सरकारी प्रतीक अंकित केक काटने से नियमों और सरकारी मर्यादा के उल्लंघन के आरोप, कार्
26 Jun, 2026
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नायक दर्पण/बालाघाट।
सुशासन के दावों के बीच बालाघाट जिले के प्रशासनिक गलियारों से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने सरकारी तंत्र की मर्यादाओं को तार-तार कर दिया है। जनपद पंचायत बालाघाट के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत लामता, इन दिनों विकास कार्यों से ज्यादा अपने अतरंगी आयोजनों के लिए चर्चा में है। यहाँ का पंचायत कार्यालय अब जनता की सेवा का केंद्र कम और 'बर्थडे सेलिब्रेशन' का हब ज्यादा नजर आ रहा है। आलम यह है कि सरकारी कार्यालय को अपनी जागीर समझने वाले जिम्मेदार अधिकारी अब ऑफिस टाइम में केक काटने और शोर मचाने में अपनी शान समझते हैं।
सरकारी केक पर ही काट दी 'स्व-शासन' की गरिमा
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दरअसल मामला 12 जून का है, जब लामता पंचायत के सचिव आशीष राहंगडाले का जन्मदिन पूरे सरकारी तामझाम के साथ मनाया गया। हद तो तब हो गई जब सचिव साहब ने जो केक काटा उस पर बाकायदा 'मध्यप्रदेश पंचायत स्थानीय स्व-शासन' का नाम लिखा हुआ था और पंचयात प्रतीक तस्वीर बना हुआ था। एक सरकारी कर्मचारी द्वारा उसी विभाग के नाम पर बना केक काटना जिसके वे सेवक हैं, न केवल प्रशासनिक मर्यादाओं का उल्लंघन है, बल्कि शासन की गरिमा का अपमान भी है।
अधिकारियों की मौजूदगी में हुआ सरकारी प्रतीक चिन्ह का अपमान
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इस जन्मदिन का आयोजन कोई छोटा-मोटा कार्यक्रम नहीं था। बकायदा पंचायत के लाउडस्पीकर का उपयोग कर शोर मचाया गया और सचिव साहब को फूलों की मालाओं से लाद दिया गया। इस जश्न-ए-बर्थडे में जनपद के अधिकारी सुरेश श्रीवास्त्री, जिला पंचायत सदस्य स्मिता टेकाम, मोतेगांव पंचयात सचिव इंदल वाडिवा, लामता सरपंच हुलासमल कोचर और रोजगार सहायक शरद जायसवाल जैसे जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग न केवल शामिल हुए। बल्कि इस तमाशे के मूकदर्शक भी बने रहे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब विभाग के अधिकारी सुरेश श्रीवास्त्री वहां मौजूद थे। तो उन्होंने सचिव को कार्यालय परिसर में इस प्रकार के अनैतिक कृत्य करने से क्यों नहीं रोका? क्या अधिकारियों की मौन सहमति ही सचिवों की मनमानी को खाद-पानी दे रही है?
सुशासन के दावों का दम तोड़ता 'कार्यालयीन समय'
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सरकारी नियमों के अनुसार, कार्यालयीन समय जनता के कार्यों के लिए निर्धारित होता है न कि सचिव के व्यक्तिगत जन्मदिन और दावत के लिए। आम जनता जो अपनी छोटी-छोटी समस्याओं के लिए घंटों दफ्तरों के चक्कर लगाती है, उसे शायद यह नहीं पता था कि जिस कुर्सी पर बैठकर अधिकारी काम करते हैं, वहीं उनके निजी जन्मदिन का जश्न मनाया जा रहा है। लामता पंचायत में जो कुछ हुआ, वह इस बात का सबूत है कि यहाँ के जिम्मेदारों को उच्च अधिकारियों का कोई डर नहीं है।
जांच के आश्वासन का 'वेटिंग गेम'
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मामला मीडिया में आते ही जिला पंचायत सीईओ अभिषेक सराफ और जनपद सीईओ ममता कुलस्ते ने जांच कर कार्यवाही करने का रटा-रटाया आश्वासन तो दे दिया है। लेकिन धरातल पर अब तक कोई ठोस कार्यवाही नजर नहीं आई है। सवाल यह है कि क्या यह जांच रिपोर्ट भी फाइलों की धूल में दफन हो जाएगी? यदि समय रहते ऐसे बेलगाम कर्मचारियों पर नकेल नहीं कसी गई तो आने वाले समय में अन्य सचिव भी इसी राह पर चलते हुए सरकारी कार्यालयों को अपनी निजी जागीर बना लेंगे।
अब सबकी नजरें कार्यवाही पर
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बालाघाट की जनता अब यह देखने को आतुर है कि प्रशासन इस 'केक कांड' पर क्या एक्शन लेता है। क्या सिर्फ कागजी खानापूर्ति की जाएगी या फिर नियम तोड़ने वाले सचिव और उन पर मेहरबान अधिकारियों के खिलाफ कोई नजीर पेश की जाएगी? मुख्यमंत्री के जन-कल्याण अभियानों की हवा लामता पंचायत में निकल चुकी है। अब गेंद जिला पंचायत सीईओ के पाले में है। देखना यह होगा कि क्या 'स्व-शासन' का मखौल उड़ाने वालों पर वाकई प्रशासन का हंटर चलेगा या यह मामला भी फाइलों के शोर में कहीं खो जाएगा।
जनता पूछ रही है:
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क्या सरकारी दफ्तर अब जन्मदिन मनाने के लिए अधिकृत हैं?
विभाग के नाम का केक काटना, क्या यह पद और गोपनीयता की शपथ का उल्लंघन नहीं है?
जनपद के अधिकारी सुरेश श्रीवास्त्री की मौजूदगी में यह सब होना, क्या उनकी मिलीभगत को नहीं दर्शाता?
बालाघाट के प्रशासनिक मुखियाओं को अब यह तय करना होगा कि पंचायत लामता है या 'पार्टी भवन'। चुप्पी साधे रखना अब प्रशासन की साख पर सवाल खड़े कर रहा है।
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