तबादला तो बहाना है, कुर्सी पर कब्जा पुराना है, पूर्व रेंजर के रसूख के आगे नतमस्तक वन विभाग। नियमों को ठेंगा दिखाकर रेंजर बिसेन ने सरकारी संपत्ति को समझा पुश्तैनी जायदाद ससुराल पक्ष कर रहा बंगले में 'राज'।
24 Jun, 2026
757 व्यूज
नायक दर्पण/बालाघाट।
मध्य प्रदेश का कश्मीर कहे जाने वाले बालाघाट जिले की प्राकृतिक सुंदरता जितनी आकर्षक है, उतने ही चौंकाने वाले आरोप यहां के कुछ अधिकारियों की कार्यप्रणाली को लेकर सामने आते रहे हैं। इसी कड़ी में वन विभाग के पूर्व में पदस्थ रेंजर धर्मेन्द्र बिसेन एक बार फिर चर्चाओं में हैं। विभागीय सूत्रों और स्थानीय स्तर पर चल रही चर्चाओं के बीच यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि आखिर ऐसा कौन-सा संरक्षण है। जिसके चलते तबादले के करीब एक वर्ष बाद भी उनका प्रभाव बालाघाट में कायम है और सरकारी आवास तक खाली नहीं कराया जा सका है।
बालाघाट का वन विभाग पिछले कुछ समय एक ऐसे ही अंगद के कारण सुर्खियों में रहा। जिसका तबादला तो हो गया लेकिन कुर्सी और सरकारी सुख-सुविधाओं पर कब्जा बालाघाट में आज भी कायम है। हम बात कर रहे हैं वन विभाग बालाघाट के पूर्व में पदस्थ रेंजर धर्मेंद्र बिसेन की जिनकी कार्यप्रणाली और विभागीय मेहरबानी अब एक बड़ा सवाल खड़ी कर रही है। विभागीय सूत्रों के अनुसार पूर्व रेंजर धर्मेंद्र बिसेन का पूर्व में बालाघाट जिले में कार्यकाल 6-8 साल से अधिक रहा। रसूख का आलम यह था कि तबादले के आदेश हवा में तैरते रहते थे। लेकिन बिसेन के कदम यहाँ से उखड़ने का नाम नहीं लेते थे। जब नायक दर्पण पत्र में समाचार प्रकाशित के सुर्खियों के चलते उनका तबादला हुआ, लेकिन बालाघाट की मोह-माया आज भी कम नहीं हुई है।
हैरत की बात तो यह है कि तबादले के एक वर्ष बीत जाने के बाद भी बिसेन ने बालाघाट स्थित अपना सरकारी आवास खाली नहीं किया है। सूत्रों का दावा है कि इस आलीशान सरकारी आवास में अब रेंजर साहब के परिजन (ससुराल पक्ष) मजे से रह रहे हैं। वहीं वर्तमान में पदस्थ रेंजर मजबूरी में किराए के मकान में रहने को विवश हैं? प्रश्न यह उठता है कि क्या वन विभाग के नियमावली में तबादले के बाद भी आवास पर कब्जा बनाए रखने का प्रावधान है? या फिर बिसेन की पहुंच इतनी ऊंची है कि सरकारी नियमों का उन पर कोई असर नहीं होता?
मामला सिर्फ आवास कब्जाने तक सीमित नहीं है। विभागीय गलियारों में चर्चा है कि पूर्व रेंजर के ससुराल के निजी कामकाज निपटाने के लिए विभाग के एक वनरक्षक को तैयार रखा गया है। कौन है वह वनरक्षक जो सरकारी ड्यूटी छोड़ रेंजर के घर की सेवा में लगा है। इसका खुलासा नायक दर्पण के आगामी अंकों में किया जाएगा।
इतना ही नहीं बिसेन पर वन विभाग और पंचायत की जमीन पर अवैध कब्जे के गंभीर आरोप भी लग रहे हैं। रेंजर साहब की कार्यशैली ऐसी रही है कि उन्होंने विभागीय संपत्ति को मानो अपनी पुश्तैनी जायदाद समझ लिया हो। क्या यह 'सरकारी दामाद' की तरह व्यवहार नहीं है? जब विभाग का ही एक अधिकारी विभाग की जमीन पर कब्जा करे तो आम आदमी से जंगल बचाने की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
सबसे बड़ा सवाल मुख्य वन संरक्षक की भूमिका पर है। क्या उच्च अधिकारियों को इस बात की जानकारी नहीं है कि एक पूर्व रेंजर सरकारी आवास में डेरा जमाए बैठा है? यदि जानकारी है, तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? क्या यह उदासीनता है या फिर बिसेन की कोई जादुई कला है जिसने आला अफसरों को भी कठपुतली बना रखा है?
बालाघाट के जंगलों की सुरक्षा के लिए जो अधिकारी तैनात किए गए हैं वे यदि स्वयं ही नियमों की धज्जियाँ उड़ाने लगें तो फिर जंगल की रक्षा कौन करेगा? यह एक ऐसा तंत्र बन गया है सूत्र कि माने तो जहाँ तबादला सिर्फ कागजों पर होता है, हकीकत में रिमोट अभी भी पुराने खिलाड़ी के हाथ में है। सिवनी शाहर में बैठकर बालाघाट रेंज और उड़नदस्ते का संचालन करना यह दर्शाता है कि विभाग में अनुशासन का नामोनिशान नहीं बचा है।
बालाघाट की जनता और वन विभाग के ईमानदार कर्मचारी अब यह जानना चाहते हैं कि आखिर पूर्व रेंजर धर्मेंद्र बिसेन के प्रति विभाग इतना मेहरबान क्यों है? सरकारी संपत्ति पर अवैध कब्जा और रसूख का इस्तेमाल कर विभाग को चुनौती देना क्या भ्रष्टाचार की श्रेणी में नहीं आता?
यह मामला सिर्फ एक आवास खाली न करने का नहीं, बल्कि व्यवस्था को चुनौती देने का है। यदि समय रहते इन पर कठोर कार्रवाई नहीं की गई, तो भविष्य में अन्य अधिकारियों का मनोबल बढ़ेगा और विभाग की साख पूरी तरह धूल-धूसरित हो जाएगी। अब देखना यह है कि क्या शासन-प्रशासन इस 'सरकारी दामाद' के रसूख को सरकारी संपत्ति को मुक्त करा पाता है, या फिर यह खेल इसी तरह बदस्तूर जारी रहेगा?
अगले अंक में हम उजागर करेंगे उस वनरक्षक का नाम जो रेंजर साहब की निजी सेवा में तैनात है, और दिखाएंगे वन विभाग और पंचयात कि उन जमीने जहाँ बिसेन ने कब्जा कर अपना साम्राज्य खड़ा कर रखा है। क्या आपको लगता है कि प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा सरकारी आवासों का इस तरह उपयोग करना विभाग की कार्यक्षमता पर सवालिया निशान लगाता है?
इनका कहना है
खली नहीं करवाया उसके लिए आपको डिवीजन से पूछना पड़ेगा रेंज अफसर डीएफओ के अंदर में है डीएफओ से बात कर लीजिए क्यों हुआ है कैसा हुआ है आपने मेरे भी संज्ञान में लाया है मैं भी ध्यान रखूंगा अच्छा हुआ बता दिए आपने डीएफओ ही करेंगे।
गौरव चौधरी
मुख्य वन संरक्षक बालाघाट
⁻⁻⁻⁻⁻⁻⁻⁻⁻⁻⁻⁻⁻⁻⁻⁻⁻⁻⁻⁻⁻⁻⁻⁻⁻
इस संबंध में नोटिस जारी किया गया है विभाग ने एक बार उनको अपना पक्ष रखने का समय दिया है
नित्यानंदम् एल
वनमण्डलाधिकारी
दक्षिण (सामान्य) वनमण्डल बालाघाट
शेयर करें
लिंक कॉपी हो गया!