सैकड़ों सागौन के पेड़ों का कत्लेआम, जंगल में अवैध कब्जा और फेंसिंग का मामला उजागर। वन विकास निगम परियोजना लामता क्षेत्र में गंभीर अनियमितताओं के आरोप, जिम्मेदारों पर मिलीभगत की आशंका।

19 Apr, 2026 41 व्यूज
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नायक दर्पण/बालाघाट।
वन विकास निगम परियोजना परिक्षेत्र लामता अंतर्गत ग्राम बरखो से लगे पश्चिम मोहगांव के कक्ष क्रमांक 1170 में सैकड़ों की संख्या में बेशकीमती सागौन के पेड़ों की अवैध कटाई का सनसनीखेज मामला सामने आया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार एक स्थानीय किसान द्वारा वन विभाग की ट्रेंच लाइन के भीतर अतिक्रमण कर न केवल जंगल की भूमि पर कब्जा किया गया। बल्कि उसी क्षेत्र से सागौन के पेड़ों का बड़े पैमाने पर अवैध कटाई कर उनका उपयोग फेंसिंग के लिए किया गया है।
सूत्रों के अनुसार संबंधित किसान ने जंगल से काटे गए सागौन के पेड़ों को पोल के रूप में इस्तेमाल करते हुए अपने खेत के चारों ओर बार्बेड वायर (कंटीले तार) की फेंसिंग कर दी है। चौंकाने वाली बात यह है कि यह पूरी फेंसिंग भी वन विकास निगम की भूमि के भीतर ही की गई है। जिससे साफ जाहिर होता है कि अतिक्रमण और अवैध कटाई दोनों ही सुनियोजित तरीके से की गई हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सागौन जैसे बहुमूल्य वृक्षों की इतनी बड़ी संख्या में कटाई एक दिन में संभव नहीं है। इसके लिए कई दिनों तक लगातार काम किया गया होगा। ऐसे में यह सवाल खड़ा होता है कि परिक्षेत्र के जिम्मेदार अधिकारियों को इस गतिविधि की भनक तक कैसे नहीं लगी। क्षेत्रीय स्तर पर निगरानी की जिम्मेदारी निभा रहे परिक्षेत्र अधिकारी राजेंद्र कुमार जरगे और वन रक्षक (बिट गार्ड) जितेंद्र बांगरे की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
ग्रामीणों और सूत्रों का आरोप है कि यह पूरा मामला अधिकारियों की मिलीभगत के बिना संभव नहीं हो सकता। उनका कहना है कि यदि समय रहते निगरानी की जाती तो इतने बड़े पैमाने पर जंगल की संपत्ति को नुकसान नहीं पहुंचता। इस घटना ने वन विभाग की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिकोण से देखा जाए तो सागौन जैसे कीमती पेड़ों की अवैध कटाई न केवल प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित करती है। बल्कि सरकार को आर्थिक नुकसान भी पहुंचाती है। सागौन की लकड़ी बाजार में अत्यधिक मूल्यवान मानी जाती है और इस तरह की अवैध गतिविधियां वन माफियाओं को बढ़ावा देती हैं।
इस पूरे मामले में जागरूक ग्रामीणों ने उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। उनकी माने तो संबंधित किसान के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए और साथ ही जिन अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध है उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाए। यदि समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में भी इस तरह की घटनाएं दोहराई जा सकती हैं और जंगलों का अंधाधुंध दोहन जारी रहेगा।
इस मामले को लेकर क्षेत्र में आक्रोश व्याप्त है और लोग प्रशासन से निष्पक्ष जांच की उम्मीद कर रहे हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वन विभाग और जिला प्रशासन इस गंभीर प्रकरण को किस तरह लेते हैं और दोषियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है।
फिलहाल यह मामला वन संपदा की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही की एक बड़ी परीक्षा बनकर सामने आया है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल एक अवैध कटाई का मामला नहीं रहेगा। बल्कि विभागीय लापरवाही और भ्रष्टाचार का भी बड़ा उदाहरण साबित होगा।