पंचायती राज व्यवस्था पर सवाल। CEO अभिषेक सराफ और विकास रघुवंशी पर सेटिंग के आरोप। सचिव की अवैध प्रभार नियमों को जूते की नोक पर रखकर सेटिंग!

01 Mar, 2026 218 व्यूज
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नायक दर्पण/बालाघाट।
मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले में पंचायती राज व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। बालाघाट जनपद पंचयात अंतर्गत की ग्राम पंचायत कोसमी में सचिव पद के प्रभार को लेकर बड़ा घोटाला सामने आया है। पूर्व सरपंच ओंकार माहुले ने कलेक्टर कार्यालय की जनसुनवाई में तीखा ज्ञापन सौंपकर जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी अभिषेक सराफ, पंचायत प्रकोष्ठ प्रभारी विकास रघुवंशी और सचिव मंजू मिश्रा के बीच सांठगांठ का गंभीर आरोप लगाया है। आरोप है कि नियम-कानूनों को दरकिनार कर मंजू मिश्रा को ग्राम पंचायत कोसमी का अवैध प्रभार सौंपा गया। जबकि उनकी मूल पदस्थापना भरवेली पंचायत में थी। यह पूरा घटनाक्रम सितंबर 2025 से लगातार जारी बताया जा रहा है। जिसे स्थानांतरण नीति का खुला उल्लंघन माना जा रहा है।
ज्ञापन के मुताबिक पहले मंजू मिश्रा का स्थानांतरण गोंगलई से भरवेली किया गया। इसके बाद 23 जून 2025 को आदेश क्रमांक-4445 के जरिए उन्हें कोसमी का अतिरिक्त प्रभार दे दिया गया। शासन स्तर पर स्थानांतरण पर रोक लगने के बावजूद 6 सितंबर 2025 को नया आदेश जारी कर भरवेली का प्रभार नंदकिशोर सिहोरे को और कोसमी का प्रभार फिर से मंजू मिश्रा को सौंप दिया गया। चौंकाने वाली बात यह है कि महज तीन दिन बाद 9 सितंबर को एक और आदेश जारी कर दिलीप महोबे को भरवेली का अतिरिक्त प्रभार दे दिया गया। पूर्व सरपंच ओंकार माहुले का आरोप है कि यह पूरा खेल सेटिंग और मिलीभगत का नतीजा है। उनका कहना है कि यदि सब कुछ नियमों के तहत हुआ है तो आदेशों की यह श्रृंखला क्यों और कैसे जारी की गई? उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि ईमानदार प्रशासन में ऐसे आदेशों की कलाबाजी संभव नहीं है।
माहुले ने मांग की है कि मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों को तत्काल पद से हटाया जाए और आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाए। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि कार्रवाई नहीं हुई तो वे जबलपुर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करेंगे। ज्ञापन की प्रतियां आयुक्त पंचायत राज भोपाल, मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग को भी भेजी गई हैं।
पंचायती राज व्यवस्था में सचिव की भूमिका बेहद अहम होती है। वही विकास कार्यों का क्रियान्वयन सरकारी योजनाओं की निगरानी और फंड का प्रबंधन करता है। यदि सचिव की नियुक्ति या प्रभार में अनियमितता होती है तो सीधे तौर पर विकास कार्य और जनता का पैसा प्रभावित होता है।
यह मामला केवल एक पंचायत तक सीमित नहीं है। बल्कि जिला पंचायत की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर रहा है। स्थानीय स्तर पर लोगों में आक्रोश है कि यदि आरोप सही हैं तो यह प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता पर गहरा आघात है। हालांकि इस पूरे प्रकरण पर अभी तक जिला पंचायत की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। न ही आरोपित अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से कोई स्पष्टीकरण दिया है।
अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं। क्या इस कथित घोटाले की निष्पक्ष जांच होगी? क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी? या फिर मामला फाइलों में दबा दिया जाएगा?
बालाघाट की जनता जवाब चाहती है। यदि आरोप साबित होते हैं तो यह केवल नियम उल्लंघन नहीं बल्कि सत्ता के दुरुपयोग और प्रशासनिक भ्रष्टाचार का बड़ा उदाहरण होगा। पंचायत व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना अब समय की मांग है।