सागौन का खुल्लमखुल्ला मची लूट: परिक्षेत्र अधिकारी और सहायक की मिलीभगत से कीमती जंगल उजड़ रहे, विभाग की आँखें बंद! पादरीगंज सर्किल के कुकड़ा टोला-बारखो में बेशकीमती सागौन की अवैध कटाई का सिलसिला जारी, सूत्रों का दावा यहाँ मिलता है प्रदेश का सबसे बेहतरीन सा
01 Mar, 2026
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नायक दर्पण/बालाघाट।
मध्य प्रदेश के वन विकास निगम की लामता परियोजना परिक्षेत्र के अंतर्गत पादरीगंज सर्किल के कक्ष कुकड़ा टोला और बारखो इलाके में बेशकीमती सागौन की अवैध कटाई का भयानक खेल चल रहा है। विभागीय सूत्रों का खुलासा है कि इस क्षेत्र में प्रदेश का सबसे उत्तम दर्जे का सागौन पाया जाता है। जिसकी बाजार में कीमत लाखों में है। लेकिन परिक्षेत्र अधिकारी राजेंद्र जरगे और उनके परिक्षेत्र सहायक इस लूट को रोकने की बजाय उसमें मिलीभगत कर रहे हैं। उनकी उदासीनता और मिलीभगत के कारण दिन दहाड़े जंगल काटे जा रहे हैं। जबकि जिम्मेदार अधिकारी आँखें मूँदे बैठे हैं। यह घोटाला न सिर्फ सरकारी खजाने को करोड़ों का चूना लगा रहा है। बल्कि पर्यावरण और वन्यजीवों के अस्तित्व पर भी सवाल खड़ा कर रहा है।
विभागीय सूत्र बताते हैं कि कुकड़ा टोला और बरखो के घने जंगलों में सागौन के पेड़ों की क्वालिटी इतनी श्रेष्ठ है कि इन्हें बेस्ट क्वालिटी सागौन कहा जाता है। इनकी लकड़ी फर्नीचर, जहाज निर्माण, मंदिरों और महंगी इमारतों में इस्तेमाल होती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक अच्छे सागौन के पेड़ की कीमत दस लाख से ऊपर तक जा सकती है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि इन जंगलों की रक्षा के लिए नियुक्त अधिकारी राजेंद्र जरगे और उनका सहायक खुद ही लुटेरों का साथ दे रहे हैं। सूत्रों का आरोप है कि दोनों अधिकारियों की मिलीभगत से अवैध कटाई का जाल फैला हुआ है। स्थानीय स्तर पर शिकायतें की गईं लेकिन जरगे साहब ने न तो कोई कार्रवाई की और न ही उच्चाधिकारियों को सूचित किया। उल्टा कटाई रुकवाने वाले लोगों को धमकाया भी जा रहा है।
यह मामला सिर्फ एक छोटा सा कटाई का मुद्दा नहीं है। यह पूरे वन तंत्र में फैले भ्रष्टाचार का जीता जागता सबूत है। वन विकास निगम की परियोजना लामता को मध्य प्रदेश सरकार ने विशेष रूप से विकसित करने का दावा किया था। यहां लाखों पेड़ों का संरक्षण और वैज्ञानिक तरीके से वन प्रबंधन का वादा किया गया था। लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। सूत्रों की माने तो पादरीगंज सर्किल के कक्ष कुकड़ा टोला और बरखो में सागौन की लकड़ी रोजाना बाहर निकाली जा रही है। स्थानीय लोग बताते हैं कि रात के अंधेरे में आरी-कुल्हाड़ियों की आवाज गूंजती है और सुबह तक पेड़ गायब हो जाते हैं। परिक्षेत्र अधिकारी राजेंद्र जरगे का दफ्तर महज दो किलोमीटर दूर है। फिर भी उनकी नजर इस लूट पर नहीं पड़ रही। क्या यह संयोग है? या फिर जानबूझकर की गई साजिश? विभागीय सूत्र साफ कहते हैं जरगे और उनके सहायक की मिलीभगत के बिना इतनी बड़े पैमाने पर कटाई संभव नहीं है।
सागौन की अवैध कटाई का पर्यावरणीय नुकसान भी कम नहीं है। ये जंगल सिर्फ लकड़ी के स्रोत नहीं बल्कि कार्बन सिंक, वन्यजीवों का घर और स्थानीय आदिवासियों की आजीविका हैं। सागौन के पेड़ वर्षा को बढ़ाते हैं। मिट्टी का कटाव रोकते हैं और जंगली जानवरों को आश्रय देते हैं। लेकिन जब अधिकारी खुद ही लुटेरों के साथ खड़े हों तो कौन रोकेगा इस तबाही को? सूत्रों का कहना है कि इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा कीमती सागौन मिलता है। इसलिए लुटेरे भी यहीं सक्रिय हैं। एक पेड़ कटने पर न सिर्फ लाखों रुपये का नुकसान होता है। बल्कि पूरा इकोसिस्टम बिगड़ जाता है। फिर भी वन विकास निगम के उच्च अधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं। क्या वे भी इस घोटाले में शामिल हैं? सवाल उठना लाजमी है।
राजेंद्र जारगे परिक्षेत्र अधिकारी के रूप में अपनी ड्यूटी निभाने की बजाय लापरवाही बरत रहे हैं। उनके पास शिकायतें आईं लेकिन उन्होंने कोई एक्शन नहीं लिया। परिक्षेत्र सहायक भी उसी लाइन पर चल रहे हैं। दोनों की मिलीभगत से कटाई जोरों पर है। स्थानीय ग्रामीणों ने कई बार फोन पर शिकायत की लेकिन जवाब मिला जांच हो रही है। जांच कहाँ हो रही है? कब तक चलेगी यह फर्जी जांच? क्या जारगे साहब सोचते हैं कि जंगल उनकी व्यक्तिगत संपत्ति है जिसे वे बेचेंगे? यह सरासर सरकारी संपत्ति की लूट है, जनता के पैसे की लूट है।
वन विभाग के इतिहास में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां अधिकारी और माफिया मिलकर जंगलों को रेगिस्तान बना देते हैं। लेकिन लामता का यह मामला सबसे शर्मनाक है क्योंकि यहां सागौन की क्वालिटी पूरे देश में मशहूर है। अगर आज नहीं रोका गया तो कल पूरे क्षेत्र के जंगल साफ हो जाएंगे। पर्यावरणविद् और स्थानीय लोग अब चुप नहीं बैठ सकते। उन्होंने मांग की है कि तत्काल उच्च स्तरीय जांच हो राजेंद्र जरगे और उनके सहायक को सस्पेंड किया जाए और अवैध कटाई में शामिल माफिया को गिरफ्तार किया जाए।
मध्य प्रदेश सरकार वन संरक्षण का बड़ा दावा करती है। मुख्यमंत्री जी कहते हैं कि जंगल हमारी धरोहर हैं। लेकिन अगर उनके ही अधिकारी जंगलों को लूट रहे हैं तो यह दावा कितना खोखला है? वन विकास निगम के प्रबंध निदेशक को तुरंत इस मामले में संज्ञान लेना चाहिए। अन्यथा यह घोटाला बड़ा रूप ले सकता है। विभागीय सूत्र चेतावनी देते हैं कि अगर तुरंत कार्रवाई नहीं हुई तो कुकड़ा टोला और बारखो के जंगल पूरी तरह नष्ट हो जाएंगे।
यह मामला सिर्फ एक परिक्षेत्र का नहीं है। यह पूरे मध्य प्रदेश के वन तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल है। अगर जिम्मेदार अधिकारी ही भ्रष्ट हैं तो आम आदमी किस पर भरोसा करे? राजेंद्र जरगे और उनके सहायक को जवाबदेह ठहराना समय की मांग है। जनता अब और चुप नहीं रहेगी। सागौन की लूट बंद होनी चाहिए जंगलों की रक्षा होनी चाहिए और भ्रष्ट अधिकारियों को सजा मिलनी चाहिए। अभी भी समय है। अगर सरकार और वन विभाग तुरंत एक्शन ले ले तो जंगलों को बचाया जा सकता है। लेकिन अगर चुप्पी साधे रहे तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ किताबों में सागौन के जंगल पढ़ेंगी हकीकत में नहीं देख पाएंगी। लामता का यह घोटाला एक चेतावनी है। या तो जंगल बचाओ, वरना भ्रष्टाचार बचाओ। फैसला सरकार और विभाग को करना है।
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