जांच के नाम पर खेल: जेसीबी–ट्रैक्टर से मनरेगा कार्य की खबर के बाद भी क्यों खामोश हैं जिम्मेदार?
09 Feb, 2026
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नायक दर्पण/बालाघाट।
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महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को ग्रामीणों के हाथों में रोजगार देने की सबसे बड़ी योजना कहा जाता है, लेकिन किरनापुर जनपद अंतर्गत कि ग्राम पंचायत मड़कापार में यही योजना मशीनरेगा बनकर रह गई है। नायक दर्पण द्वारा जेसीबी और ट्रैक्टर–फावड़ा से कराए जा रहे कार्यों का खुलासा किए जाने के बावजूद आज तक न तो जांच शुरू हुई और न ही किसी जिम्मेदार पर कार्रवाई हुई। सवाल यह नहीं है कि नियम टूटे या नहीं, सवाल यह है कि जांच को आखिर दबाया क्यों जा रहा है?
सूत्रों के मुताबिक इस पूरे मामले में जांच टीम का गठन भी हो चुका है और संबंधित जांच पत्र (लेटर) जारी किया जा चुका है, लेकिन इसके बावजूद जांच टीम अब तक गांव नहीं पहुंची। चर्चा है कि सरपंच और सचिव के साथ मिलकर कुछ अधिकारियों ने सेटिंग कर जांच लेटर को ही दबा दिया है। यही वजह है कि खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ने के बाद भी प्रशासन मौन साधे बैठा है।
मनरेगा के स्पष्ट दिशा निर्देश कहते हैं कि सड़क निर्माण, मिट्टी कार्य और अन्य कार्य पूरी तरह श्रम आधारित होंगे। मशीनों का उपयोग प्रतिबंधित है। इसके बावजूद ग्राम पंचायत मड़कापार में जेसीबी और ट्रैक्टर फावड़ा से सड़क निर्माण कराया गया। हैरानी की बात यह है कि हाजिरी रजिस्टर में मजदूरों की फर्जी उपस्थिति दर्ज कर भुगतान निकाल लिया गया, जबकि वास्तविकता में मजदूरों को काम ही नहीं मिला। जागरूक ग्रामीणों का आरोप है कि मशीन मालिकों को लाभ पहुंचाने के लिए यह पूरा खेल रचा गया। सरपंच, सचिव, रोजगार सहायक और उपयंत्री की कथित मिलीभगत से सरकारी राशि का बंदरबांट किया गया। मजदूरों के नाम पर लाखों रुपये निकाले गए लेकिन जिनके नाम पर भुगतान दिखाया गया उन्होंने कभी काम ही नहीं किया।
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब अखबार में पूरे सबूतों के साथ खबर प्रकाशित हुई, वीडियो फोटो सामने आए, ग्रामीणों ने शिकायतें कीं तो फिर प्रशासन क्यों नहीं जागा? क्या जिले के वरिष्ठ अधिकारियों को इस पूरे मामले की जानकारी नहीं है या जानबूझकर आंखें मूंद ली गई हैं?
सूत्र बताते हैं कि जैसे ही जांच की बात आगे बढ़ी वैसे ही दबाव की राजनीति शुरू हो गई। जांच टीम का गठन तो हुआ, लेकिन उसे फील्ड में भेजने से पहले ही रोक दिया गया। कहा जा रहा है कि जांच लेटर को फाइलों में दबाकर रख दिया गया है ताकि मामला ठंडा पड़ जाए।
जागरूक ग्रामीणों कि माने तो यदि यही हाल रहा तो मनरेगा जैसी जनकल्याणकारी योजना का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। मजदूरों को रोजगार देने की जगह मशीनें चलाकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया जा रहा है। यही नहीं फर्जी हाजिरी से शासन को भी आर्थिक नुकसान पहुंचाया जा रहा है।
यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या जिला पंचायत और जनपद पंचायत के अधिकारी इस पूरे मामले से अनजान हैं? अगर अनजान हैं तो यह उनकी घोर लापरवाही है और अगर जानकर भी चुप हैं तो यह सीधी मिलीभगत मानी जाएगी। जागरूक ग्रामीणों का आरोप है कि कुछ अधिकारियों को मैनेज कर लिया गया है, इसलिए अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
जागरूक ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र जांच कर दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई तो वे कलेक्टर कार्यालय और जिला पंचायत के सामने आंदोलन करने को मजबूर होंगे। उनका कहना है कि मनरेगा उनका कानूनी अधिकार है और इसे लूट का जरिया नहीं बनने दिया जाएगा।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है क्या जांच सिर्फ कागजों तक सीमित रहेगी? क्या जिम्मेदार अफसर सरपंच–सचिव को बचाने में लगे हैं? या फिर इस मामले में कोई बड़ा संरक्षण काम कर रहा है?
नायक दर्पण यह सवाल लगातार उठाता रहेगा क्योंकि यदि इस मामले को दबा दिया गया तो यह न सिर्फ मड़कापार बल्कि पूरे जनपद में भ्रष्टाचार को खुली छूट देने जैसा होगा। अब देखना यह है कि प्रशासन कब नींद से जागता है और कब मशीनों से लूटी गई मनरेगा की सच्चाई सामने आती है।
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